नमस्कार! ब्लॉग्स पेज पर आपका हार्दिक स्वागत है। यहाँ प्रकाशित सभी लेख डॉ. सुमित दिंडोरकर द्वारा लिखे गए हैं।
डॉ. सुमित दिंडोरकर न केवल एक अनुभवी होम्योपैथिक चिकित्सक हैं, बल्कि मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता एवं आत्मिक उपचारकर्ता (Spiritual Healer) भी हैं। इसके साथ-साथ वे हिंदी भाषा के विद्वान, संवेदनशील कवि और समसामयिक विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाले मूर्धन्य लेखक हैं।
बचपन से ही विविध विषयों की पुस्तकों का अध्ययन, सीखते-सिखाते रहना तथा मानव मनोभावों के सूक्ष्म अध्ययन में उनकी विशेष रुचि रही है। अपने इन्हीं मौलिक विचारों और अनुभवों को वे इन ब्लॉग लेखों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं।
आशा है ये लेख आपको सोचने, समझने और स्वयं से जुड़ने का अवसर देंगे। आराम से पढ़िए… शब्दों के बीच स्वयं को खोजिए।
24-1-2019
5:45pm
मित्रों, बहुत दिनों के बाद कुछ पोस्ट कर रहा हूँ। मैंने "बहुत दिनों के बाद कुछ लिख रहा हूँ" ऐसा नहीं कहा क्योंकि लिखना तो होते ही रहता है। कभी सफ़ेद कागज़ पर तो कभी अपने मानस पटल पर। व्यक्ति को लिखते रहना चाहिए। साइकोलॉजी अथवा मानसशास्त्र के अनुसार हमारे मस्तिष्क से हरदम कुछ न कुछ सृजित होते रहता है। अभिव्यक्त करने हेतु हम बोलकर या लिखकर अथवा अभिनय या अपनी भाव भंगिमाओं का उपयोग करते रहते हैं। किन्तु लिखना एक ऐसा माध्यम है जिसमे हम अपने शब्दों को आकार देते हैं। यह ऐसा है मानो अपनी दिमागी धूप को हाथ रुपी बिल्लोरी काँच के माध्यम से अक्षरों में केंद्रित करके कुछ प्रज्वलित करने का प्रयास करना। अस्तु...
आज की इस पोस्ट का कारण है मानवी वृत्ति के विभिन्न पहलुओं का दर्शन कराना। पिछले कई वर्षों से मैं अपने क्लिनिक में आने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य हेतु उनकी साइकोलॉजिकल काउन्सलिंग भी कर रहा हूँ। होम्योपैथी में साइकोलॉजी बहुत ही विस्तृत और गहराई से पढ़ाई जाती है। चूंकि बचपन से ही विभिन्न व्यक्तियों के मन की थाह लगाने का प्रयास करने में मेरी गहन रूचि रही है। यही अवलोकन-क्षमता मेरे काम भी आयी। कालांतर में मैंने इसी क्षमता को एक सच्चे एवं सुसंस्कृत प्रोफेशन में परिणित कर लिया। अतः मैं बड़ों और बच्चों की व्यावहारिक काउन्सलिंग से लेकर वैवाहिक काउंसलिंग, करियर काउन्सलिंग एवं जेनेटिक काउंसलिंग भी बड़े मनोयोग से कर रहा हूँ। मनोवैज्ञानिक परामर्श देते समय एक साइकोलोजिस्ट को मरीज के भावनात्मक पक्ष को जानने हेतु उससे स्वयं भी भावनात्मक रूप से जुड़ना ही पड़ता है, तभी काउन्सलिंग सार्थक हो पाती है। ऐसे समय कई बार मनुष्य की नकारात्मक प्रवृत्तियों से भी पाला पड़ता है जिनको जानकर मन खिन्न हो उठता है। मनुष्य आज बहुत स्वार्थी और ढोंगी हो गया है। हमारे आसपास के ही लोगों की बात करें तो हमें केवल उनका सामाजिक रूप दिखता है। इसे मैं FAKE AURA अथवा आम भाषा में चोला कहता हूँ। काउंसलिंग के दौरान व्यक्ति से जब निजी प्रश्न पूछे जाते हैं तभी वह धीरे-धीरे अपने विराट स्वरुप की झलक दिखलाने लगता है। यह विराट स्वरुप भगवान् कृष्ण के विराट रूप जैसा दैदीप्यमान ही हो ऐसा ज़रूरी नहीं है; वरन वह "कृष्ण-विवर"(अंग्रेजी में BLACK HOLE) की तरह स्याह काला भी हो सकता है। वर्तमान परिस्थितियों में देश में घटित हो रही अनगिनत प्रिय-अप्रिय घटनाओं के पीछे यही मनोविज्ञान कार्य कर रहा है। अवचेतन मस्तिष्क जब परत-दर-परत उद्भेदित होता है,तभी यह ज्ञात होता है कि वस्तुतः हमारा मन एक ऊन के गोले जैसा है...एक उलझा हुआ गुच्छा... जिसका कोई ओर छोर नहीं है। व्यक्ति स्वयं पूरे जीवन काल में इसे नहीं जान पाता है। काउंसिलर्स भी पानी में डूबे हुए इस हिमखंड की केवल ऊपरी परत को हल्का सा ही छील पाते हैं। ऐसे में शीतल हवा का झोंका तब आता है जब कतिपय वास्तविक सज्जन मनुष्यों की काउंसलिंग होती है। कुछ लोगों की प्रवृति जैसे बाहर है वैसे ही अंदर से भी हैं। एकदम दैवीय। ऐसे लोगों के मन को टटोलकर अपार शांति की अनुभूति भी होती है। शुभ्र और स्याह दोनों तत्व हमारे मन के अंदर ही हैं। हमारा विवेक(अर्थात अच्छे और बुरे की समझ) ही वास्तविक छन्नी(फ़िल्टर) का काम करता है ताकि हम दैवीय या आसुरी वृति में से किसी एक का चुनाव करें। और यही चुनाव हर घटना को जन्म दे रहा है।
अंत में यही लिखूंगा कि-"सृजन प्रतिक्षण हो रहा है...दैवीय चाहिए या आसुरी यह निर्णय आपका है।".
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
24-4-2019
1:00pm
“बात कड़वी पर गुणकारी”
क्लिनिक से घर आते समय मेरी गाड़ी के आगे रोड पर एक "सज्जन" अपनी बाइक से चल रहे थे। देहयष्टि और परिधान से सुसंस्कृत लगने वाले उन महानुभाव के कानों में आधुनिक झुमका(मोबाइल का इयरपीस)दमक रहा था। तभी अचानक उनका सिर बाजू में मुड़ा और पिच्च करती हुई गुटखे की पिचकारी मार्ग के डिवाइडर पर उड़ाकर,अपनी सभ्यता का वास्तविक परिचय देते हुए वे तेजी से निकल लिए। अवाक सा होकर मैंने ध्यान से देखा। इस कलाकार ने स्वच्छ भारत अभियान के चित्र में उकेरे गए गांधीजी के चश्मे को 2 बराबर भागों में सटीक विभक्त कर दिया था। निशाना अचूक था। मैंने सोचा कि ऐसे निशानची को ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने क्यों न भेजा जाये? हमारे आस-पास ऐसे असंख्य जुगालीधारी जीव बड़ी मात्रा में बिन होली के रंगकारी और बिन दीवाली के रंगोली बनाते रहते हैं। इनमें से कई इस समय इसी पोस्ट को पढ़ते हुए मुस्कुराते हुए अपनी इस वीरोचित आदत से मजबूर होकर वाशरूम के बेसिन को या आंगन में तुलसी के गमले को बचाते हुए दीवार को लाल करके आए हैं। धिक्कार है ऐसे मन के हारे हुए निखट्टूओं को। आदतें अच्छी या बुरी हो सकती हैं किन्तु अपनी आदतों के कारण आसपास या अन्य लोगों परेशानी हो यह कतई सहन नही होना चाहिए। इस बीमारी के उपचार के रूप में लोग तम्बाकू, पाउच या सुपारी के सेवन को सरकार द्वारा पूर्णतया प्रतिबंधित करने की बात करते हैं पर मैं एक बात बड़ी बेबाकी से कहूंगा कि केवल 5 वर्ष की बहुमत वाली कोई भी सरकार वास्तव में पंचवर्षीय योजना जैसी ही आती जाती रहेंगी। अत्यंत कठोर निर्णय और उनका त्वरित क्रियान्वयन लंबे समय तक किया जाए तभी परिणाम सकारात्मक आएंगे। एक पूरी पीढ़ी का समय लगेगा देश की ऐसी गुटखाखाऊ जनता को सुधारने के लिए। इस प्रजाति में नेता, पुलिस, अफसर, कर्मचारी, डॉक्टर, शिक्षक, वकील यहाँ तक कि विद्यार्थी भी आते हैं। यदि ऐसा कठोर क्रियान्वयन नही हो सकता तो मेरा एक तुच्छ सुझाव-अच्छा हो कि यदि ऐसे लोग नित्य दिन में 10 बार गुटखा खाने के स्थान पर एक ही बार विष गटक लें।
“बात कड़वी पर गुणकारी”
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
11-5-2019
7:40pm
नमस्कार मित्रों। आज मैं आपको एक छोटी किन्तु बहुमूल्य सौगात के बारे में बताना चाहता हूँ। वह है-"थपकी"। अंग्रेज़ी में थपकी की परिभाषा यह है कि- The gentle tapping on back,face or chest of any person by his/her beloved to provoke peace/rest/assurance.
यह थपकी इतनी अनमोल इसलिए है क्योंकि यह बच्चों के मनोविज्ञान की कई त्रुटियों को अनायास ही दूर कर देती है। प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान के अनुसार जिन लोगों को बचपन में उनके माता-पिता अथवा अभिभावक(guardian) ने सोते समय थपकी देते हुए सुलाया है उन्हें बड़े होने पर मनोरोग होने की संभावना लगभग शून्य रहती है। ऐसे लोग जीवन के किसी भी मोड़ पर कभी हताश नही होते और इनकी तनाव झेलने और संघर्ष करने की शक्ति अदम्य रहती है। थपकी देते समय जो लयबद्ध थापें दी जाती है वो हमारे अवचेतन मस्तिष्क के अति गूढ़ "संगीत केंद्र" को उन्मीलित करती है। कालांतर में ऐसे बच्चें संगीत की दिशा में उन्मुख होते हैं और वे अपने जीवन को भी एक उतार चढ़ाव वाले संगीतमय सप्तक के रूप में देखकर आनंदित रहते हैं। मेरे क्लिनिक पर बच्चों की काउंसलिंग करवाने आने वाले अभिभावकों को कई बार मैं इसी निःशुल्क पर अत्यंत प्रभावी उपचार "थपकी" की सलाह देते रहता हूँ। दंभयुक्त और भारतीयों पर थोपी गई तथाकथित "आधुनिक" चिकित्सा पद्धति अब धीरे-धीरे अपनी जड़ों को प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान में टटोलने का प्रयत्न कर रही है। तो आज से ही आप सभी इसी मधुर थपकी की जादुई जैविक ऊर्जा को स्वयं भी अनुभव करें और अपने बच्चों तक निःसंदेह सम्प्रेषित करें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
12-5-2019
4:53pm
मित्रों,टैगोर पार्क स्थित मेरे क्लिनिक पर कई अभिभावक एक समस्या लेकर आते हैं कि गर्मी की छुट्टियों में बच्चों के पास बहुत समय होता है। इस समय को बच्चें कार्टून देखने या सुस्त पड़े रहते हुए बिताते हैं। अतः इन छुट्टियों के सदुपयोग में माता पिता किस तरह बच्चों की मदद कर सकते हैं? मैं उन्हें काउंसलिंग के माध्यम से यह बताता हूँ कि आप इन छुट्टियों के दो महीने उनके प्राकृतिक संरक्षक बनें यानी आप भी उनके साथ छुट्टियां बिताएंगे.ऐसे ही कुछ टिप्स हम सभी के लिए
-अपने बच्चों के साथ कम से कम दो बार भोजन अवश्य करें। उन्हें किसानों के महत्व और उनके कठिन परिश्रम के बारे में बताएं, और उन्हें बताएं कि भोजन बेकार न करें।
-भोजन के बाद उन्हें अपनी प्लेटें खुद धोने दें। इस तरह के कामों से बच्चे मेहनत का महत्व समझेंगे। साथ ही कभी कभी उन्हें अपने साथ भोजन बनाने में मदद करने दें। उन्हें उनके लिए सब्जी या फिर सलाद बनाने दें।
-पड़ोसियों के घर जाएं। उनके बारे में और जानें और घनिष्ठता बढ़ाएं।
-दादा-दादी/ नाना-नानी के घर जाएं और उन्हें बच्चों के साथ घुलने मिलने दें। उनका प्यार और भावनात्मक सहारा आपके बच्चों के लिए बहुत आवश्यक है। उनके साथ तस्वीरें लें।
-उन्हें अपने काम करने की जगह पर लेकर जाएं जिससे वो समझ सकें कि आप परिवार के लिए कितनी मेहनत करते हैं।
-किसी भी स्थानीय त्योहार या स्थानीय बाजार को मिस न करें।
-अपने बच्चों को किचन गार्डन बनाने के लिए बीज बोने के लिए प्रेरित करें। पेड़ पौधों के बारे में जानकारी होना भी आपके बच्चे के विकास के लिए आवश्यक है।
-अपने बचपन और अपने परिवार और देश के इतिहास के बारे में बच्चों को बताएं। साथ ही बच्चों को राष्ट्र के संसाधनों का सदुपयोग और भारतीय सेना का सम्मान करना सिखाएं।
-अपने बच्चों का बाहर जाकर खेलने दें, चोट लगने दें, गंदा होने दें। कभी कभार गिरना और दर्द सहना उनके लिए अच्छा है। सोफे के कुशन जैसी आराम की जिंदगी आपके बच्चों को आलसी बना देगी।
-उन्हें कोई पालतू जावनर जैसे कुत्ता, बिल्ली, चिड़िया या मछली पालने दें।
-उन्हें कुछ लोकगीत सुनाएं और महापुरुषों की प्रेरणादायी कहानियाँ सुनाएं।
-अपने बच्चों के लिए रंग बिरंगी चित्रों वाली कुछ कहानी की पुस्तकें लेकर आएं।
-अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें। इन सबके लिए तो उनका पूरा जीवन पड़ा है। बजाय इसके शतरंज, साँप-सीढ़ी, केरम आदि घरेलू खेल स्वयं उनके साथ खेले।
-उन्हें चॉकलेट्स, जैली, क्रीम केक, चिप्स, कुरकुरे, गैस वाले पेय पदार्थ और पफ्स जैसे बेकरी प्रोडक्ट्स और समोसे जैसे तले हुए खाद्य पदार्थ देने से बचें।
-अपने बच्चों की आंखों में देखकर ईश्वर को धन्यवाद दें कि उन्होंने इतना उत्कृष्ट उपहार आपको दिया। अब से आने वाले कुछ वर्षों में वो नई ऊंचाइयों पर होंगे।
माता-पिता होने के नाते ये आवश्यक है कि हम अपना समय बच्चों को दें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
16-5-2019
9:32am
"डॉक्टर साहब,मेरे बच्चे को भूख ही नही लगती। वो कुछ खाता ही नही है।" मैं ये वाक्य आये दिन अपने क्लिनिक पर अभिभावकों से सुनता रहता हूँ। पहले मैं खाना ना खाने के लिए बच्चे को ज़िम्मेदार मानता था पर कालांतर में जब मैंने बच्चों के मनोविज्ञान को जाना तब मैंने भूख लगने वाली दवाई पर देने की बजाय माता-पिता को काउंसलिंग देना शुरू किया। अब मैं उन्हें समझाता हूँ यह संभव नही है कि दिन भर मस्ती और दौड़भाग करने वाले बच्चों को भूख ना लगे। बात केवल इतनी सी है कि बच्चें केवल स्वाद ढूंढते हैं और आप माता पिता यह चाहते हैं कि बच्चा वो सब खाये जो उसे परोसा जाता है और जो घर में बनता है। एक जैसा स्वाद का भोजन बच्चें पसंद नहीं करते हैं। 100 में से 99 प्रतिशत बच्चें बाहर का तथाकथित स्वादिष्ट(?) खाना अर्थात नूडल्स, मंचूरियन, पिज़्ज़ा, कचोरी, पानी पूरी इत्यादि इसीलिए पेट भर कर खाते हैं क्योंकि उन्हें घर की सब्जी रोटी या दाल में स्वाद नही मिलता। हाँ…यदि घर पर उनकी पसंद की (या कहे उनके स्वाद की कसौटी पर खरी उतरने वाली )सब्जी बनाई जाए तो वो जी भर कर खाते हैं। बात साफ है। बच्चों को भूख तो लग रही है साहब लेकिन पापी पेट को भरने का रास्ता चटोरी जीभ से होकर गुजरता है। आजकल के बच्चें अपनी उम्र से थोड़े अधिक ही स्मार्ट हैं। ऐसे में माता-पिता को भी अपनी स्मार्टनेस बढ़ानी पड़ेगी जिसके लिए आप निःसंदेह अपने "स्मार्ट-फोन" का सदुपयोग करें। मैं माताओं को सलाह देता हूँ कि इंटरनेट या यूट्यूब से नई नई रेसिपी निकालें और सीखें। मार्केट को खंगालेंगे तो आप पाएंगे कि दर्जनों भिन्न-भिन्न स्वाद वाले मसालें उपलब्ध है। मैं यह कहने का दुःसाहस नही कर रहा हूँ कि हमारी माताएं और बहनें अच्छा भोजन नही पकाती हैं। पर बच्चें तो बच्चें ठहरे। मैं काउंसलिंग में केवल इतना आग्रह करता हूँ कि माताएं बच्चों के स्वाद को भी उनकी सेहत के समकक्ष रखें और फिर देखें कि हमारे भारत की यह भावी पीढ़ी अपने सुपोषित और हट्टे-कट्टे व्यक्तित्व से परिवार,समाज और देश की सेवा किस तरह से करती है। अधिक जानकारी के लिए मुझसे सीधे संपर्क करें। आपको यह पोस्ट कैसी लगी अवश्य कमेंट करें तथा इस पोस्ट को शेयर करें। साथ ही इस पेज को लाइक और फॉलो भी करें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
19-7-2019
5:55pm
नमस्कार मित्रों। आज का विषय है-"बच्चों में पढ़ाई को छोड़कर दूसरी बातों में अधिक रुचि लेना।"
रुचि अर्थात “Interest” । इसे अभिरुचि, लगाव, झुकाव, दिलचस्पी अथवा आसक्ति भी कहते हैं। हर व्यक्ति का इंट्रेस्ट अलग अलग विषयों में हो सकता है। उदाहरणार्थ किसी की रुचि मोबाइल में हो सकती है और किसी की खेल-कूद में। कोई मीठे के प्रति आसक्त है और कोई सैर-सपाटे के प्रति। आज का हमारा विषय केवल बच्चों के मन की आसक्तियों पर ही केंद्रित नहीं है बल्कि हम सभी वयस्कों के मनोविज्ञान से भी सम्बंधित है। अतः इस पोस्ट को गौर से पढ़ें।
सबसे पहले मैं आपको यह बता दूँ कि किसी विषय (या क्षेत्र )में अभिरुचि होना अपने आप में एक वरदान है। यह मन की एक छोटी सी इच्छा से शुरू होता है। हमारी अभिरुचि यह दर्शाती है कि जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण कितना सकारात्मक है। संगीत, नृत्य, खेल-कूद, मनोरंजन की ही सही पर पुस्तकें या कॉमिक्स पढ़ना या कुछ न कुछ लिखते रहना ये उत्कृष्ट व्यक्तित्व की ओर संकेत करती हैं। इसी के विपरीत अति टीवी देखना, फुर्सत मिलते ही मोबाइल में घुस जाना, कुछ नहीं करना, जीवन के प्रति कोई उमंग नहीं रहना यह त्वरित पतन का पर्याय है।
अब बात करें बच्चों की। मेरे क्लिनिक में आजकल हर दूसरी काउन्सलिंग का सत्र बच्चों की पढाई में रुचि नहीं होने पर होता है। संवाद के दौरान यह बातें सामने आती हैं कि डॉ.साहब, मेरे बेटे को आप मोबाइल दे दो या दोस्तों से बाते करने को बोल दो तो वो दिन भर उत्साह से लगा रहेगा। बस पढ़ाई का बोलते ही छाती पर सांप लोटने लगते हैं। प्रथमदृष्टया इसमें बच्चों की गलती लगती है पर गहराई से देखने और पूछने पर यह पता चलता है बच्चों के माता-पिता स्वयं ही आरम्भ से अपने ही जीवन के प्रति उदासीन रहे हैं। एकदम ठंडेगार। माता को न त्योहारों में रुचि रही है और ना ही उसने कभी किसी अच्छी पुस्तक या उपन्यास के पन्ने उलटकर देखें हैं। बस दिन भर रसोईघर में लगी रहती है और वो भी मन मारकर। भोजन बनाने में भी रुचि नहीं बल्कि विवशता के कारण बना रही है। घर को सजाना, खुद के शौक को उत्साह से जीवंत रखना यह महिलाएं भूल चुकी हैं। यही हाल बच्चे के पिता के होते हैं। दिन भर घर के बाहर रहने वाला पिता केवल पैसे कमाने में लगा है। स्वयं की अभिरुचि समझने की प्राथमिकता कहीं खो गयी है। शाम को घर आने पर पिता शारीरिक के साथ साथ मानसिक रूप से भी इतना थका हुआ होता है कि सोफे या पलंग पर बैठकर न्यूज़ देखने या व्हाट्सअप, फेसबुक पर कॉपी-पेस्ट का खेल खेलने लग जाता है।
*माता-पिता ही जब किताबों में इंट्रेस्ट नहीं लेंगे तो बच्चा कैसे लेगा? *माता पिता ही जब संगीत,चित्रकला ,नृत्य में इंट्रेस्ट नहीं लेंगे तो बच्चा कैसे लेगा? *माता पिता ही जब त्योहारों को उत्साह से नहीं मनाएंगे और बच्चों के सामने उदाहरण नहीं प्रस्तुत करेंगे तो बच्चा त्योहारों में भी बोर हो जायेगा। *माता पिता ही यदि सामाजिक नहीं है अथवा बागवानी या पौधे लगाने में इंट्रेस्ट नहीं दिखाएंगे तो बच्चा तो अति-अंतर्मुखी और एकाकी हो ही जायेगा ना ?
यही प्रश्न हमें स्वयं से पूछना है। केवल रविवार को राधावल्लभ मार्केट में बच्चों को चायनीज़ खिलाकर कर्तव्यों से पल्ला झाड़ने वाले अभिभावक यह स्मरण रखें कि अच्छी आदतें व संस्कार सिर्फ छुट्टी के दिन नहीं सिखाये जाते। बच्चें हर समय सीखते जा रहे हैं। हमें देखकर अनुकरण करते जा रहे हैं। यह सीखने की प्रक्रिया जन्मतः उन्हें मिली हुई है। जैसा वातावरण उन्हें घर पर मिलेगा वो वैसा ही सीखेंगे। बच्चों की छोटी सी उम्र में यदि उन्हें स्कूल की पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ दूसरा पढ़ने की आदत नहीं लगायी तो वह बड़ा होकर केवल विवशता में स्कूल की पुस्तकों को हाथ लगाएगा। और यह "कुछ दूसरा पढ़ने की आदत" माता पिता को पहले स्वयं लगानी होगी। बच्चों को समय दें। उनके साथ उनके बनाये हुए खेल खेलें। उनके बालमन के उत्साह को मरने ना दें। हमारा घर ही बच्चों के जीवन की पाठशाला है और हमें ही उनके परममित्र(BEST FRIEND) बनकर उन्हें कदम-कदम पर जीवन के हर विषय में रस लेना सिखाना होगा। समय निकलता जा रहा है। हम अपने जीवन के एक-एक क्षण को रस लेकर जियें और उसमें बच्चों को सम्मिलित करें। आपकी इसी प्रवृत्ति को बच्चें एक उदाहरण मानकर स्वयं के जीवन पर लागू करेंगे।
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~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
23-7-2019
8:42am
अभिवादन मित्रों। आज का हमारी मनोवैज्ञानिक चर्चा का विषय है-"चश्मा" आपको लग रहा होगा कि मनोविज्ञान में चश्मे का क्या उपयोग? पर मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आज का यह विषय इस पोस्ट को पढ़ने वाले कई लोगों की आंखे खोल देगा। मेरे क्लिनिक पर होने वाले काउंसलिंग के केसेस में से लगभग आधे केस इसी विषय पर आधारित रहते हैं।
मित्रों दुनिया में जितने भी मनुष्य हैं सभी अपनी-अपनी विचारधारा का चश्मा लगाए हुए हैं। सभी लोग इस विश्व को अपनी-अपनी दृष्टिकोण, अपने नजरिए से देखते रहते हैं। "या दृष्टि सा सृष्टि" के शास्त्रसम्मत दर्शनवाक्य से अचूक प्रेरित। किसी व्यक्ति के लिए कुछ परिस्थितियाँ बड़ी विकट प्रतीत होती हैं और इसी के विपरीत कुछ मनुष्यों के लिए एकदम सहज। केवल परिस्थितियां ही नहीं कुछ लोगों को कई अन्य लोग इसी चश्मे के कारण आँख में खटकते भी रहते हैं।
ऐसे लोग अपने चश्मे के बहाने से सामने वाले को कसौटी पर कसते रहते हैं और सामने वाले के प्रति अपने मन में भ्रान्तियाँ और धारणाएँ बना लेते हैं। बात केवल धारणाएँ बनाने तक रहती तो ठीक था किंतु ऐसे चश्मे वाले लोग सामने वाले से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह भी उनके चश्मे से ही दुनिया देखे। वास्तव में वो बड़ा भारी दबाव बनाते है कि सामने वाला उनके हिसाब से चले। यहाँ तक कि उनके जैसा ही बन जाये।
यह मनोविज्ञान का एक बड़ा ही रोचक पहलू है। मराठी में एक कहावत है-आपल्या सारखे असावे सकळ। समस्या यही से शुरू होती है। उदाहरण के लिए-माता पिता चाहते हैं कि बच्चा वैसा जीवन जिये जैसा उन्होंने जिया है। पर वो भूल जाते हैं कि अभिभावकों के बचपन का समय-काल और परिस्थितियाँ एकदम अलग थी और आज एकदम अलग। किन्तु चश्मे वाले लोग 'अपनी ढपली-अपना राग' वाली उक्ति को चरितार्थ करने में लगे रहते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि जब प्रकृति का मूलभूत नियम ही परिवर्तन का है तो देशकाल और वातावरण के अनुसार लोगों की विचारधारा का परिवर्तनीय विकास भी अवश्यम्भावी है।
क्लिनिक पर आए दिन यही देखने सुनने को मिलता है कि मेरा वह रिश्तेदार बुरा है क्योंकि उसने ऐसा किया अथवा मेरी वो रिश्तेदार बहुत अच्छी है क्योंकि उसने ऐसा किया। कई बार तो अपने चश्मे के कारण सामने वाले के दुर्गुण भी हमें महान सद्गुण की तरह दिखलायी पड़ते हैं। ऐसे लोग जग में हमेशा ठोकाते पिटाते रहते हैं। हमेशा दुःखी रहते हैं। रोते रहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड भर के कष्टों का पहाड़ उन्ही के ऊपर टूट पड़ा है। ऐसे लोगों की काउंसलिंग बड़ी जटिल होती है। पहले उनकी सारी बातों को सुनकर उन्हें अपने चश्मे का नंबर बदलने के लिए बोलना पड़ता है। खुद को बदलने का बोलते ही मुझे अनियंत्रित बाढ़ की तरह प्रबल विरोध झेलना पड़ता है क्योंकि किसी पिंड द्वारा बदलाव का विरोध करना तो न्यूटन का नियम है ही। पर धीरे धीरे चरणबद्ध काउंसलिंग के कई सत्रों के पश्चात व्यक्ति थोड़ा स्थिरमति(स्थितप्रज्ञ नही) हो पाता है। तब उसे विवेक (अर्थात अच्छे बुरे की समझ) की एक छोटी सी किरण दिखती है। और केस सुलझ जाता है।
पर ऐसे लोग जो अपने चश्मे को बदलना ही नही चाहते और अपने कुँए के मेंढक वाली मानसिकता में ही रहना चाहते हैं उनको समझाना मतलब भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है क्योंकि जो व्यक्ति सो रहा है आप उसे जगा सकते हैं पर जो सोने का नाटक कर रहा है वह कभी जागता नही है।
अस्तु।
कर्मण्यैवाधिकारस्ते……
ऐसी ही मनोविज्ञान और चिकित्सा विज्ञान संबंधी रोचक जानकारियों के लिए मेरे पेज को लाइक और फॉलो करें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
18-9-2019
5:49pm
नमस्कार मित्रों। सर्वप्रथम तो कई प्रकार की प्राथमिकताओं व अन्य व्यस्तताओं के कारण इस बार पोस्ट डालने में जो विलम्ब हुआ उसके लिए क्षमा और साथ ही आज मेरे जन्मदिवस पर जो आप सभी का अनन्य स्नेह प्राप्त हुआ उसके लिए ह्रदय के अंतरतम से आभार।
आज का हमारा विषय है-"Google से पढ़ी जाने वाली मेडिकल सम्बन्धी जानकारी की सच्चाई और परिणाम। "
मित्रों ,मेरे क्लिनिक "मॉडर्न होम्यो क्लिनिक" पर ऐसे मरीज़ भी आते हैं जो पहले से Google महाराज पर अपनी बीमारी के बारे में पढ़ कर आते हैं। या कहें आतंकित होकर आते हैं। वास्तव में वो जिज्ञासावश अपने शरीर में होने वाले परिवर्तनों के बारे में जागरूकता के नाते इंटरनेट पर जानकारी जुटाते हैं।
गूगल, यूट्यूब अथवा chatGPT जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाली साइट्स पर मेडिकल सम्बन्धी अनगिनत जानकारियां और वीडियो रहते हैं पर सभी में उल्लेख किये गए केस/लक्षण स्वयं पर लागू हो ही ऐसा आवश्यक नहीं है। परिणाम-अनावश्यक तनाव। बीमारी के डर का टेंशन इतना अधिक हो जाता है कि मरीज़ का खाना-पीना सब बंद हो जाता है।
ऐसी कहावत है कि अल्पज्ञान सर्वथा घातक होता है। आधा-अधूरा पढ़ा हुआ गूगल-ज्ञान कब संक्रामक अपचन बन जाता है पता ही नहीं चलता।
अतः मेरा सभी को यह सुझाव है कि अपनी बीमारी के बारे में गूगल से जानकारी जुटाते समय सावधान रहते हुए अपने मन को अनावश्यक भटकाव से बचाएं और विशेषज्ञ डॉक्टर से सीधे संपर्क करके शंकाओं का समाधान करें। चिकित्सा विज्ञान में ऐसे कई अंधे कुँए हैं जिनको सामान्य व्यक्ति ना ही जाने तो अच्छा है।
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~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
18-1-2020
3.30pm
अभिवादन मित्रों। अपने बचपन में हम में से हर एक व्यक्ति पतंग उड़ा चुका है।एक समय था जब साल भर हर मोहल्ले की किराणा दुकानों पर पतंगे भी बिका करती थी। छुट्टी के दिन तो सुबह से ही मोहल्ले के बच्चें घर के पतरों(लोहे की नालीदार चद्दरों) पर दोस्तों की टोली के साथ चढ़ जाया करते थे।
बड़ी उम्र के कतिपय अनुभवी भैया बड़ी नापतौल और संतुलन के साथ पतंग की जोते बांधा करते थे। हम उत्साहित बच्चों को अवसर मिलता था उडंची देने का। पतंग उड़ने की बहुत देर बाद हमें केवल कुछ मिनटों के लिए पतंग को थामने का स्वर्णिम अवसर दिया जाता था, वो भी सख़्त निर्देशों के साथ।
फिर भी हम इस दायित्व को बड़ी जिम्मेदारी से निभाकर कुशल विजेता की भाँति प्रसन्न हो जाया करते थे। वास्तव में उस समय के बच्चें हर स्तर पर बहुत उन्नत थे। भले ही तब मोबाइल जैसी सुविधाएं और मनोरंजन के तकनीकी साधन नहीं थे पर वास्तव में वही सही "आधुनिकपना" था और आजकल के बच्चें मोबाइल के कारण बहुत पिछड़ गए हैं।
कमाल देखें, जिसे आधुनिक समझा वह असल में महापिछड़ा निकला…
वाह री दुनियादारी…
इसलिए बच्चों के साथ पतंग उड़ाएं और उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ और वास्तविक आधुनिक बनाये रखें।
अस्तु।
प्रस्तुत है तब के पतंगशास्त्र के शब्दकोष के शब्द। कुछ शेष रह जाए तो कमेंट में अवश्य लिखियेगा।
१-रंगीन ताव(पतला कागज़)
२-कमान हड्डे(बाँस की चिपलियाँ)
३-लई(चिपकाने वाला द्रव्य)
४-बड़ा पतंग=फ़र्रा
५-छोटा पतंग=डुगडुगी
६-माँजा(काँच के चूरे को गरम चिपचिपे सरस द्वारा सूत के धागे पर विधिवत लगाकर मज़बूत बनाया हुआ तंतु)
७-गिर्री(माँजा लपेटने हेतु लकड़ी की बनी चरखी)
८-जोते(माँजे से पतंग को जोड़ने वाले २ हाथ)
९-पुछंडी(पतंग की दुम)
१०-उडंची(पतंग को हवा में ऊपर उछालना)
११-ढील देना
१२-हिचकी देना
१३-पेंच लड़ाना(२ पतंगों के माँजों का मुकाबला)
१४-वो काट्टा है
१५-गिर्री चूम(गिर्री का पूरा माँजा खाली करना)
१६-पतंग उतारो
१७-गुथापाथ(माँजा खींचने की हड़बड़ी के हुई उलझन)
पोस्ट मन को भाये तो लाइक करके आगे बढ़ाएं और हाँ अपने विचार अवश्य रखें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
4-2-2020
1:13am
आज का हमारा विषय है-"कैंसर"
कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनते ही व्यक्ति हड्डियों तक कांप जाता है। इसे कर्करोग या माँसार्बुद भी कहते हैं। विश्व भर में लाखों लोग इस बीमारी से पीड़ित है और प्रति मिनट कई लोगों की मृत्यु कैंसर के द्वारा हो रही है पर आपको जानकार आश्चर्य होगा कि मलेरिया से मरने वालों की संख्या कैंसर या किसी भी अन्य घातक बीमारी से मरने वालों की संख्या से कई गुना अधिक है। तथापि कैंसर वास्तव में घबराने वाली बीमारी तो है ही पर असाध्य नहीं है।
कैंसर का अर्थ है शरीर में कुछ ज्ञात(अधिकतर अज्ञात) कारणों से एक ऐसी गठान निर्मित होती है जिसकी कोशिकाएं द्विगुणित होती ही रहती है। एक अमर कोशिकीय मांसपिंड की तरह। यहां तक कि जिस शरीर में वह गठान पनप रही है उसे भी वह सुखा देती है।
तम्बाकू-शराब जैसे व्यसन, व्यायाम की कमी, कीटनाशकों वाली सब्जियाँ और अनाज, खाने में डालने वाले रंग, प्लास्टिक का उपयोग, सौंदर्य प्रसाधनों के रसायन, मोबाइल का अत्यधिक उपयोग, धूप में अधिक समय बिताना, तनाव आदि कई ज्ञात कारण हैं। यह बीमारी किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकती है। खिलाड़ियों से लेकर फिल्मस्टार और डॉक्टर से लेकर नेताओं तक और यहाँ तक कि नियमित व्यायाम-प्राणायाम करने वाले निर्व्यसनी लोगों को भी।
एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में डॉक्टर्स उस गठान को ऑपरेशन द्वारा निकाल लेते हैं और रेडिएशन या विकिरण द्वारा बची हुई कोशिकाओं को जलाकर कीमोथेरेपी अर्थात जहरीली दवाओं द्वारा रोगी का उपचार करते हैं ताकि कैंसर की बची-खुची कोशिकाएं भी खत्म हो जाए। एक भी कोशिका शरीर में रहने नहीं चाहिए ऐसा उनका सिद्धांत है। रोगी कैंसर से तो ठीक हो सकता है पर रेडिएशन और कीमोथेरेपी के पार्श्व-प्रभाव(side effects) इतने पीड़ादायी होते हैं कि व्यक्ति की इच्छाशक्ति ही खत्म हो जाती है।
होम्योपैथी में कैंसर का इलाज संभव है। जी हां…होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति वास्तव में आधुनिक शिक्षा पद्धति कहलाने योग्य है क्योंकि इसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर कोशिकाओं को अपने प्राकृतिक रूप में रहने के लिए प्रेरित कर सकने वाली दवाइयां उपलब्ध हैं।
मैं पिछले 3 वर्षों से होम्योपैथिक दवाइयों द्वारा कैंसर के इलाज पर खोज और अध्ययन कर रहा हूं। मेरे पास कुछ ऐसे रोगी भी हैं जिनको बायोप्सी के माध्यम से कैंसर का पता चला था पर होम्योपैथी की बारिक-बारिक मीठी गोलियों से अब वह बिना ऑपरेशन, रेडिएशन या कीमोथेरेपी के केवल होम्योपैथिक इलाज के द्वारा पूरी तरह से ठीक होकर आरोग्य लाभ ले रहे हैं। अभी भी कई खोजे की जानी बाकी है। होम्योपैथी जैसे आधुनिकतम किंतु गहन चिकित्सा पद्धति में अध्ययन की बहुत आवश्यकता पड़ती है। होम्योपैथिक डिग्री लेने के बाद भी डॉक्टर को आजीवन विद्यार्थी बने रहना पड़ता है।
इतने पर भी यदि एक होम्योपैथिक डॉक्टर 10 में से 2 कैंसर के रोगियों को भी बचा सके या उनकी पीड़ा कम कर सके तो यह मानवता की सच्ची जीत होगी।
हे प्रभु श्रीराम। सभी को कैंसर जैसी घातक बीमारी से बचाये और जो पीड़ित हैं उन्हें लड़ने का सामर्थ्य प्रदान करें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
25-5-2020
7.18pm
होम्योपैथ की यह नौबत क्यों आई कि बायो मेडिकल वेस्ट हेतु सरकार को अलग से अनुमति लेने के लिए हमें बाध्य करना पड़ रहा है। इस समस्या का मूल कारण मैं बताता हूं।
एक छात्र जब 11वीं में बायोलॉजी विषय लेता है तब उसके माता-पिता और आसपास के लोग ही उसे सपने दिखाने लग जाते हैं कि मेरा बेटा तो एमबीबीएस डॉक्टर बनेगा या सर्जन या एमडी बनेगा। कालांतर में नीट एग्जाम में पास ना होने के कारण या अन्य किसी विवशता में होम्योपैथी/आयुर्वेदिक धारा को चुनना पड़ता है। ये तो वही बात हो गई कि उसका पहला प्यार तो एलोपैथी था लेकिन शादी होम्योपैथी से हो गई ,पर दिल में आज भी एलोपैथी बस रही है। मैं ऐसे एक नहीं हजारों उदाहरण दे सकता हूं जो होम्योपैथी डिग्री को केवल एलोपैथी प्रैक्टिस करने हेतु बटोरना चाहते हैं। रही सही कसर फाइनल इयर और इंटर्नशिप तक आते-आते छात्र के द्वारा देखा गया माहौल पूरी कर देता है। अंत में डिग्री मिलने के बाद शुरू होता है दबाव का कुचक्र।
दबाव-पैसा कमाने का…
दबाव-अपने परिवार में स्वयं के डॉक्टर होने के रुतबे का…
दबाव-जल्दी शादी करके सेटल होने का…
दबाव-बूढ़े होते मां बाप की जिम्मेदारी को उठाने का…
ऐसे में वह होम्योपैथिक डॉक्टर मन मार कर ड्यूटी डॉक्टरशिप की राह पकड़ लेता है या किसी तहसील मुख्यालय या ग्रामीण क्षेत्र में जाकर इंजेक्शन और ड्रिप लगाना शुरू कर देता है। यहां तक कि अपने क्लीनिक में एलोपैथिक दवाइयों का एक बड़ा जखीरा भी तैयार कर लेता है और सरकार पर एलोपैथी प्रैक्टिस की आधिकारिक अनुमति हेतु दबाव बनाने का प्रयत्न करने लगता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अभी पिछले वर्ष ही किसी एक्ट को पास कराने के लिए जुटी हुई होम्योपैथ की भीड़ से प्रमाणित हो चुका है।
अब यह विचार करने योग्य बात है कि ऐसे में एक होम्योपैथ जो मजबूरीवश एक ऐलोपथ बन गया है वह सरकार को होम्योपैथी के सभी डॉक्टर्स के बारे में क्या इमेज बनाने को बाध्य करेगा? वे होम्योपैथ जो विशुद्ध रूप से अपने धर्म अर्थात होम्योपैथी पर टिके हुए हैं उनकी छवि या इमेज भी बायो मेडिकल वेस्ट उत्पन्न करने वाले डॉक्टर की हो जाती है और इसीलिए सरकार ने आयुष के सभी लोग डॉक्टर्स को बायो मेडिकल वेस्ट का प्रमाणपत्र लेने की अनिवार्यता रखी है। पर अंततः नुकसान तो होम्योपैथी का हुआ ना?
ये मेरे निजी विचार है जिनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करने का कदापि नही है। आशा है कि मेरे इन विचारों के पीछे की शुद्ध भावना को समझकर प्रत्युत्तर दिया जाएगा। दिल पर मत लेना पर दिमाग पर लेना यही निवेदन।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
15-6-2020
5:37pm
नमस्कार मित्रों।
आज का हमारा विषय है- "अवसाद(डिप्रेशन) से आत्महत्या तक-" सुशांतसिंह राजपूत, प्रत्यूषा बनर्जी, जिया खान, गुरुदत्त, मर्लिन मुनरो, रॉबिन विलियम्स जैसे कई सफल बॉलीवुड व हॉलीवुड कलाकारों के अतिरिक्त संत भय्यूजी महाराज और यह सूची बहुत लंबी है। कलाकार-आम आदमी, नेता या संत, युवा-बच्चे एवं वृद्ध, असफल-सफल, सुंदर-कुरूप, अमीर-गरीब…हर उम्र और वर्ग के मानव आत्महत्या के इस श्राप से ग्रस्त है। जीवन में परिवार का प्रेम, दोस्तों की यारी, आध्यात्मिकता, पैसा, कसरत, पुस्तकें, बागवानी या संगीत जैसे शौक होने के बाद भी प्रतिवर्ष कई लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अवसाद की अवस्थाओं और आत्महत्या की मनःस्थिति पर मैं थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयास करता हूँ।
१-पहली अवस्था में व्यक्ति जब निराश होता है तब उसका अवचेतन मस्तिष्क का एक उजला कोना उसे ढांढस बँधाता है। इस प्रक्रिया में उसके संस्कारों और पारिवारिक पृष्ठभूमि और उसके शौक, दोस्ती-यारी या उसके नैतिक मूल्यों का विशेष प्रभाव पड़ता है। सामान्य व्यक्ति कई बार इस अवस्था से गुजर चुका होता है। 100 में से 90 प्रतिशत मामले इस अवस्था से स्वतः ही ऊपर आ जाते हैं।
२-दूसरी अवस्था में व्यक्ति निराशा के समुद्र में अधिक गहरा उतर जाता है। वह ऊपर से सारी गतिविधियों में सम्मिलित होता है पर अंदर ही अंदर वह क्रियाकलापों या लोगों से मिलने जुलने के आनंद से विलग होता जाता है। काउंसलिंग से ऐसे सारे मामले सुलझाए जा सकते हैं।
३-तीसरी और सबसे अंतिम अवस्था में व्यक्ति अवसाद के गहरे समुद्र के तल पर बैठा हुआ होता है। अपने ऊपर निराशा के पानी का करोड़ो टन का वजन लिए उस व्यक्ति का जीवन बहुत दयनीय हो जाता है। सनातन शास्त्रों में जिस नरक का उल्लेख किया गया है वह यही है। ऐसा कहते हैं कि व्यक्ति का मस्तिष्क इस अवस्था में ऐसी विचित्र फ्रीक्वेंसी पर स्थिर होता है जो कि तामसिक अथवा नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित करता है। ऐसे कई उदाहरण देखने मे आते हैं जहाँ इस अवस्था के निराश व्यक्ति को सर्वत्र नकारात्मकता की परछाइयाँ दिखाई देती है जो उसे गलत कदम उठाने को विवश कर देती है। ऐसे में व्यक्ति ना चाहकर भी आत्महत्या करने पर बाध्य हो जाता है। इस अंतिम अवस्था में भी मन का वह उजला कोना अपना अंतिम प्रयास करता है व्यक्ति को दिलासा देने का। अब तक उस मनुष्य का व्यक्तित्व बहुत ही नाज़ुक हो जाता है और विवेक(अच्छे बुरे की समझ) खो चुका होता है जिसके कारण गलत निर्णय लेने का संवेग प्रबल हो जाता है।
परिणाम-एक और आत्महत्या।
आज आवश्यकता है ऐसी शिक्षा प्रणाली की जो बचपन से ही बच्चों को हारने पर भी खुश रहना सिखाये। युवा पीढ़ी को "क्या लेकर आये थे और क्या लेकर जाएंगे" वाले भगवद्गीता के वैश्विक सत्य को स्वीकार करना सिखाना हमारा परम कर्तव्य है। मन को स्वच्छ और स्वभाव को सरल रखना भी एक अच्छी आदत है। उपायों की विस्तृत जानकारी के लिए आप मुझसे व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर सकते हैं।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
27-6-2020
10:33am
मित्रों,क्लीनिक पर एक व्यक्ति से चर्चा के दौरान मुझे मेरे छः वर्षीय बेटे का फ़ोन आया। कभी कभार वह किसी विशेष मनुहार के लिए उसकी माँ से कहकर मुझे फ़ोन लगवा दिया करता है। उससे मैं हमेशा मेरी मातृभाषा मराठी में ही बात करता हूँ।
फ़ोन रखने के बाद मेरे सामने बैठे व्यक्ति ने तिरस्कार करते हुए पूछा- "डॉ.साहब, आप इतने मॉडर्न होकर भी मराठी भाषा में बात करते हैं?"
मैं(चकित)-"मातृभाषा में बात करने से मॉडर्न नही होने का क्या संबंध? हमारे घर पर तो हम सभी आपस में हमारी मातृभाषा मराठी में ही बात करते हैं। आजकल ठेठ पुणे से आये हुए और मराठी में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त किये संभ्रांत लोग भी मध्यप्रदेश में आने के 6 महीनों बाद ही मराठी बोलना भूल जाते हैं। मातृभाषा के प्रति ऐसा खोखला स्वाभिमान?"
व्यक्ति बोला-"मेरी मातृभाषा निमाड़ी है लेकिन मैं तो भूल से भी मेरे बच्चे को निमाड़ी नहीं सिखाऊंगा।
भुजंग की तरह फड़फड़ाते हुए उस व्यक्ति पर अपनी तीसरी आँख टिकाते हुए मैं गंभीरता से बोला-"निमाड़ी जैसी मीठी और जमीन से जुड़ी हुई भाषा के बारे में आपके ऐसे तुच्छ विचार? और जबकि वह आपकी मातृभाषा है। मातृभाषा अर्थात वह भाषा जो आपको आपकी माँ सिखाती है। यह प्रेम की भाषा है। मातृभाषा अनुकरण करके सीखी जाती है। अन्य भाषाएं तो बच्चें बाहर के वातावरण में या स्कूल में सीख ही जायेंगे किन्तु मातृभाषा कहाँ से सीखेंगे? और यहाँ प्रश्न अपनी मातृभाषा को संजोकर उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का है।
मैं हमेशा से यह मानता आया हूँ कि भारत मे हर व्यक्ति को न्यूनतम 3 भाषाएं आनी ही चाहिए। प्रथमतः उसकी मातृभाषा(जिसकी जो भी मातृभाषा हो, जैसे मराठी, निमाड़ी, गुजराती, मालवी), दूसरी राष्ट्रभाषा अर्थात गौरवशाली हिंदी। तीसरी क्षेत्रीय भाषा, जैसे कि यहाँ निमाड़ी। हमारे घर में सभी सदस्य धाराप्रवाह मराठी के साथ-साथ लगभग शुद्ध निमाड़ी भी बोल लेते हैं। घर में माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे बच्चों से अपनी मातृभाषा में ही बात करें तभी वह भाषा जीवंत रहेगी अन्यथा संस्कृत की तरह विलुप्त हो जाएगी।"
उसने कहा-"पर ये भाषाएं तो बहुत पुरानी हैं। आधुनिक शिक्षा के विकास से बहुत पीछे। कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने वाले हमारे बच्चे से हम टूटी-फूटी ही सही मगर अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं। और हाँ…अभी वह छोटा है इसलिए हिंदी में भी बात करते हैं।"
आता माझी सटकली😡
मैंने कहा-"बंधु, जिन भाषाओं को तुम पिछड़ा हुआ समझ रहे हो उन्ही भाषाओं के पीछे का रहस्य आधुनिक वैज्ञानिक जानना चाह रहें हैं। सभी भारतीय भाषाओं और बोलियों के शब्दों के उच्चारण से जो सूक्ष्म स्पंदन बनते हैं उनसे गले और स्वरयंत्र के अनेक कैंसर और अन्य बीमारियाँ टाली जा सकती है। तभी तो हमारे पूर्वज हज़ारों वर्षों से संस्कृत में श्लोकों को गाते आये हैं।
संस्कृत में 2 अरब से अधिक शब्द हैं। और नासा ने सिद्ध कर दिया है कि संस्कृत जिस प्रकार से भूतकाल में सार्वभौमिक भाषा थी ठीक उसी प्रकार वह एक बार फिर भविष्य में सार्वभौमिक भाषा बनेगी क्योंकि यह स्पेस लैंग्वेज यानी कि अंतरिक्ष में भी अप्रभावी रहनी वाली कूट भाषा(code language) है। इसके अलावा कई जटिल अक्षर जैसे कि "ळ" जो केवल मराठी और निमाड़ी में ही आता है। और एक बात, 2 से अधिक भाषाएं बोलने वाले बच्चों का दिमाग अन्य बच्चों के दिमाग की अपेक्षा अधिक विकसित होता है। अब बताओ ,मॉडर्न कौन?" 😎
मेरी धुआँधार शब्दवृष्टि से उन सज्जन की तथाकथित "मॉडर्न इमारत" उनके अंतर्मन के तीसरे रसातल तक भरभराकर गिर चुकी थी। संस्कृत कहाँ से सीखी जा सकती है, यह अंतिम प्रश्न पूछने के बाद ठेठ निमाड़ी में मुझसे "राम-राम" बोलते हुए उन्होंने विदा ली।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
25-5-2021
3:18pm
तवाड्डा(तुम्हारा) कुत्ता टॉमी…
साड्डा(हमारा) कुत्ता कुत्ता??
यह दोगलापन कहाँ से आया 🙄🙄
आयुर्वेद और होम्योपैथी को हर कदम पर अग्निपरीक्षा के लिए कहा जाता है। लेकिन एलोपैथी को सौ गलतियाँ माफ?
ये एक फैक्ट है, या केवल मेरे दिमाग का भ्रम... कहना कठिन है।
ताज़ा वायरस के मामले में...
1-पहले हाईड्रॉक्सिक्लोरोक्विन को अचूक माना... दुनिया में भगदड़ मची उसको लेने की। फिर उसका नाम हटा लिया, कहा कि वो प्रभावी नहीं।
2-सैनिटाइजर को हर वक़्त जेब में रखने की सलाह के बाद उसके ज़्यादा उपयोग के खतरे भी चुपके से बता दिए गए।
3-फिर बारी आई प्लाज़्माथैरेपी की। पूरा माहौल बनाया, रिसर्च रिपोर्ट्स आईं, लोग फिर उसमें जी जान से जुट गए। लेने, अरेंज और मैनेज करने और प्लाज़्मा डोनेट करने में भी।
और फिर बहुत सफाई से हाथ झाड़ लिया, ये कहते हुए... कि भाई ये इफेक्टिव नहीं है।
4-स्टेरॉयड थैरेपी तो क्या कमाल थी भाई साहब। कोई और विकल्प ही नहीं था। कई अवतार मार्केट में पैदा हुए। कालाबाज़ारी हो गई, बेचारी जनता ने भाग दौड़ करते हुए, मुँहमांगे पैसे दे कर किसी तरह उनका इंतज़ाम किया। अब कहा गया कि ब्लैक फंगस तो स्टेरॉयड के मनमाने प्रयोग का नतीजा है।
5-रेमडेसीवीर इंजेक्शन तो जीवनरक्षक अलंकार के साथ मार्केट में अवतरित हुआ। इसको ले कर जो मानसिक, शारीरिक और आर्थिक फ्रंट पर युद्ध लड़े जाते उनकी महिमा तो मीडिया में लगभग हर दिन गायी जाती। लेकिन अरबों-खरबों बेचने के बाद अब उसको भी अप्रभावी' कह कर चुपचाप साइड में बैठा दिया।
दूसरी तरफ मात्र 20 रुपये की होम्योपैथिक दवा आर्सेनिक एल्बम 30, 100 रुपये की Aspidosperma Q, या 500 रुपये के मासिक खर्च वाले कोरोनिल, 20 रुपए के काढ़े और 10 रुपए की अमृतधारा को हर दिन कठघरे में जा कर अपने सच्चे और काम की वस्तु होने का प्रमाण देना पड़ता है।
क्लीनिकल रिसर्च ही अगर आधार है तो फिर इतने यू टर्न क्यों ? टेस्ट अगर जनता पर ही करने हैं तो फिर हिमालयन जड़ी बूटी वाला खानदानी दवाखाना क्या बुरा है !
जनता का फॉर्मूला बहुत सीधा है: "महंगा है, अंग्रेज़ी नाम है... तो असर ज़रूर करेगा। और साइड इफ़ेक्ट ? वो तो हर चीज़ में होते हैं।"
आयुर्वेद और होम्योपैथी :- आपको अभी पीआर के फ्रंट पर बहुत सीखना है। अपना इको सिस्टम तैयार करो। नहीं तो, किसी दिन संजीवनी बूटी या कोई अन्य मदर टिंक्चर आया तो उसको भी लोग नकार देंगे। समझे ना...?
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
30-6-2021
5:18pm
नमस्कार मित्रों
"हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विनोन" नाम याद है?
गत वर्ष यह दवाई कोरोना प्रोटोकॉल के अंतर्गत सरकार दे रही थी व जिसकी कालाबाजारी के बाद सरकार को इसका निर्यात बंद करना पड़ा ताकि यह आसानी से भारतीयों के लिए उपलब्ध हो सके। इसके बाद रेमडेसीविर इंजेक्शन के साथ भी यही हुआ। अंततः सरकार को इसका निर्यात भी बंद करके इसे आम जनता के लिए उपलब्ध कराना पड़ा।
यही अवस्था अब एक होम्योपैथी की दवाई की हो रही है जिसके मेसेज whatsapp और फेसबुक पर इन दिनों लॉकडाउन में अखंड फालतू बैठे हुए लोग अपने मुफ्त के 4G डेटा को खर्च करके यहाँ-वहाँ फॉरवर्ड कर रहे हैं। पर वो यह नही जानते कि इससे दवाई किसी जरूरतमंद को मिले ना मिले किन्तु कालाबाजारी व्यक्ति अवश्य इसे संग्रह करके रख लेगा ताकि अवसर मिलने पर इसे दुगने दाम में बेचकर गाढ़ा मुनाफा कमाया जा सके।
इन घटनाओं का वास्तविक कारण क्या है?
इसका कारण है-"हम भारतीयों की काली पड़ चुकी अंतरात्मा"।
हम लोग वैसे बुरे लोग नहीं हैं। गौरवशाली इतिहास और संस्कृति का चोला पहने हुए हम लोग स्वयं को विदेशी आतताइयों से दमित और वर्तमान में सरकारी योजना को छुप-छुप कर चूसने के बाद भी अत्यंत दीन-हीन दर्शाते हैं पर जब भी हमें कालाबाजारी का सुअवसर मिलता है तो हम अवसर का लाभ उठाने में कतई नहीं चूकते हैं।
बात हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विनोन की हो, रेमडेसीविर की हो, ऑक्सीजन सिलेंडर की हो, पल्स ऑक्सीमीटर की हो या अभी अभी वायरल हुई होम्योपैथी की किसी दवाई की हो।
मरते हुए भी हम कालाबाजारी करके कमाया हुआ पाप अपनी किस्मत में ठूंसकर मरना चाहते हैं ताकि मरने के बाद जब चित्रगुप्त हमारा लेखा-जोखा देखें तो उसे भी तरस आ जाए और वह कहे कि-"हे पापी आत्मा, नरक में भी तेरे लिए बेड(जगह) नहीं है।"
अतः कालाबाजारी बंद करें और स्वविवेक का उपयोग करें व अनावश्यक मेसेज यहाँ वहाँ अग्रेषित ना करें।
घर पर रहें और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करें।
~मूल लेखक
डॉ.सुमित दिंडोरकर
B.H.M.S.,M.D.
होम्योपैथ व काउंसिलर
Spiritual Healer
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
(Estd.–1982)
सोमवार से शनिवार: प्रातः 10 से 2 एवं शाम 5 से 9
रविवार: 10 से 2 बजे तक।
+91 8435784747
+91 7999662723
डॉ.सुमित दिंडोरकर
मॉडर्न होम्यो क्लिनिक
टैगोर पार्क के सामने, श्रीराम धर्मशाला के पीछे
खरगोन, मध्यप्रदेश – 451001